जंगली सूअरों में अफ्रीकन स्वाइन फीवर की पुष्टि, वन विभाग और पशुपालन विभाग में हड़कंप

रायपुर। छत्तीसगढ़ में जंगली सूअरों में अफ्रीकन स्वाइन फीवर (एएसएफ ) की पुष्टि होने से वन विभाग और पशुपालन विभाग में हड़कंप है। बरेली स्थित इंस्टीट्यूट ऑफ वेटरिनरी रिसर्च की जांच रिपोर्ट में इस घातक वायरस की पुष्टि हुई है।
छत्तीसगढ़ के प्रधान मुख्य वन संरक्षक (वन्यप्राणी) अरुण पाण्डेय ने बताया है कि कुछ दिनों पूर्व छत्तीसगढ़ के बलौदा बाजार, महासमुंद समेत कई इलाकों में बड़ी संख्या में जंगली सूअरों की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी। इन मौतों के बाद सैंपल जांच के लिए बरेली भेजे गए थे।
अब आई रिपोर्ट में अफ्रीकन स्वाइन फीवर से मौत की पुष्टि हो गई है। रिपोर्ट मिलने के बाद वन विभाग ने कई जिलों के डीएफओ को सतर्कता बढ़ाने और निगरानी तेज करने के निर्देश दिए गए हैं। नेशनल लायब्रेरी ऑफ मेडिसिन के अनुसार, भारत में 90 लाख से अधिक सूअर हैं, जिनमें से 45 फीसदी भारत के उत्तर पूर्वी राज्यों में हैं।
सूअरों को प्रभावित करने वाली वायरल बीमारियां मृत्यु दर का एक प्रमुख कारण हैं, जिससे सूअर पालकों को भारी नुकसान होता है। अफ्रीकी स्वाइन फीवर (एएसएफ) सूअरों और जंगली सूअरों की एक अत्यधिक संक्रामक, विनाशकारी बीमारी है जिससे गंभीर मृत्यु दर होती है।
एएसएफ, अफ्रीकी स्वाइन फीवर वायरस के कारण होता है, जो कि एस्फरविरिडे परिवार के एस्फीवायरस जीनस से संबंधित एक आनुवंशिक रूप से जटिल वायरस है। एएसएफ को एक अधिसूचित बीमारी के रूप में सूचीबद्ध किया गया है।
इस बीमारी का पहली बार वर्णन 1900 के दशक की शुरुआत में किया गया था जब यूरोपीय सूअर की नस्लों को केन्या कॉलोनी में लाया गया था और बाद में यह बीमारी 1957 में यूरोप (पुर्तगाल) में प्रवेश कर गई, जिसे जल्दी ही नियंत्रित कर लिया गया, लेकिन 1960 में पुर्तगाल में फिर से प्रवेश कर गई और इबेरियन प्रायद्वीप और शेष यूरोप में फैल गई ।
इसके अलावा, 2007 में रूसी संघ में प्रगति हुई और 2018 में चीन, फिर वियतनाम और म्यांमार और भारत में फैल गई । एएसएफवी अंतरमहाद्वीपीय रूप से फैल रहा है। अफ्रीकन स्वाइन फीवर घरेलू और जंगली सूअरों में फैलने वाला एक अत्यधिक संक्रामक और जानलेवा वायरल रोग है, जिसमें मृत्यु दर लगभग 100फीसदी तक हो सकती है।
बताया गया है कि यह बीमारी सूअरों के सीधे संपर्क, दूषित मांस/अपशिष्ट, या टिक्स के माध्यम से फैलती है, लेकिन मनुष्यों के लिए हानिरहित है। इसका कोई टीका या उपचार उपलब्ध नहीं है। इसके लक्षण हैं तेज बुखार, त्वचा में लाली/नीलापन, कमजोरी, भूख न लगना, दस्त, उल्टी और सांस लेने में कठिनाई।
यह संक्रमित जानवरों, दूषित भोजन, या कपड़ों/उपकरणों के माध्यम से फैलता है। इस बीमारी से बचाव का एकमात्र तरीका बायोसेफ्टी (जैविक सुरक्षा) उपाय अपनाना, संक्रमित सूअरों को नष्ट करना और सख्त निगरानी रखना है।



