chhattisgarh

पंड़कीपाली(सरायपाली) में 5 कुंडिय विश्व शांति वैदिक महायज्ञ संपन्न

सरायपाली।। “यज्ञो वै श्रेष्ठतमं कर्म” अर्थ है “यज्ञ वास्तव में सबसे श्रेष्ठ कर्म है”। यह केवल अग्नि में आहुति देना नहीं, बल्कि नि:स्वार्थ भाव से शुभ कर्म करना, पर्यावरण की शुद्धि, मानसिक शांति और सामाजिक कल्याण का प्रतीक है। यह वेद-सम्मत, सर्वश्रेष्ठ और दिव्य कर्म माना गया है।
प्रदेश सह-संयोजक VB-G-RAM-G योगेश्वरानंद योगी ने कहा कि हमारे संत प्रवर श्री विज्ञान देव जी महाराज जी हमेशा कहते हैं कि वैदिक हवन यज्ञ हमारे भीतर त्याग की भावना का विकास करता है। मैं और मेरा से ऊपर उठकर विश्व शान्ति का मार्ग प्रशस्त करता है। यह श्रेष्ठ मनोकामनाओं की पूर्ति और पर्यावरण शुद्धि का भी साधन है। श्रेष्ठतम कर्म है यज्ञ।
यज्ञ हमारी ऋषि संस्कृति का अभिन्न अंग है। विश्व का गुरु भारत ऋषियों का देश है। छत्तीसगढ़ की धरती यह भी कई ऋषियों की तप:स्थली है। जो सुख और शान्ति हम संसार के पदार्थों में खोजते हैं। हमारे ऋषियों ने, हमारे संतों ने उसे स्वयं अपने भीतर पाया है। हर आत्मा में अन्तरात्मा रूप से स्थित ईश्वर है, परमात्मा है जो अद्भुत आनन्द है, परमानन्द है। जैसे दूध के कण कण में मक्खन भरा है, परन्तु युक्ति से प्राप्त होता है, वैसे ही ईश्वर भी कण-कण में व्याप्त है और योग युक्ति से प्राप्त होता है। हम ईश्वर की संदेशी दूत, महान आत्माओं की पुण्यतिथि हम इसीलिए मनाते हैं कि उनके बताये मार्ग पर चल सकें। उस युक्ति को प्राप्त कर सकें। अध्यात्म वीरों का पथ है।

कार्यक्रम के संबोधन में पुरुषोत्तम लाल सपहा ने बताया कि वास्तविक जीवन का उद्देश्य क्या है? विहंगम योग की प्रथम भूमि का उपदेश श्री कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध क्षेत्र में कैसे दिया था? मानव जीवन का कल्याण कैसे संभव है? विहंगम योग के क्रियात्मक साधना बतलाया गया कि इस साधना से कैसे तनाव मुक्त, अवसाद मुक्त, भय, अनिद्रा आदि से मुक्त होकर सुखमय जीवन व्यतीत करने का संदेश दिया गया।

कार्यक्रम की मुख्य वक्ता श्रीमती प्रिया शास्त्री ने बताया विहंगम योग क्या है? मानव जीवन के मुख्य उद्देश्य को चरितार्थ करते हुए कहा कि “छोड़कर संसार जब तू जायेगा कोई न साथी तेरा साथ निभाएगा” कैसे हम भवसागर पार होंगे? कैसे सदगुरु देव ने अमरलोक पहुंचाने का संकल्प लिया है उसे जनमानस में विस्तृत रूप से बताया।

आगे योगेश्वरानंद योगी ने बताया कि वर्ष 1888 ई. में बलिया के पकड़ी ग्राम में अवतरित अनन्त श्री सद्गुरु सदाफलदेव जी महाराज ने विश्व भर में ब्रह्मविद्या विहंगम योग द्वारा एक लाख जीवों को जन्म मरण के चक्र से छुड़ा देने का संकल्प लिया है। सदगुरु सत्ता के तृतीय वर्तमान परम्परा आचार्य श्री सदगुरु स्वतंत्र देव जी महाराज के सान्निध्य विश्व के कोने-कोने में ब्रह्मविद्या विहंगम योग का प्रतीक विश्व विजयिनी “अ” अंकित श्वेत ध्वजा पताका लहरा रहा है।

उपरोक्त कार्यक्रम में विशेष सहयोग ग्राम सरपंच श्रीमती लुभावनी वृंदावन पटेल का रहा।
इस पावन अवसर पर ग्राम की प्रभावशील सरपंच श्रीमती लुभावनी वृंदावन पटेल, प्रवक्ता श्रीमती प्रिया शास्त्री, आर एन साहू, पी एल सपहा, ग्राम मुखिया डीलेश्वर नायक, पंच मनोज नायक, गोपीचंद, सूरज पटेल, जितेंद्र पटेल, शुभम बारिक, दिल किशोर प्रधान, उपदेष्टा लव कुमार पटेल, देवबत्ती पटेल, परमानन्द बारिक, वासुदेव पटेल, ललित कुमार, पुनीत लाल, गिरजा शंकर, मनोहर नायक, सत्यनारायण, वेणु पटेल, कंपाल बारिक, जयराम पटेल, लोकेश फर्रीकर, शांति तिवारी, पूर्णिमा चौधरी, आशा चौबे, लता साहू, सोनी धीवर सहित सैकड़ों संख्या में श्रद्धालु, गुरूभाई-बहन कार्यक्रम में शामिल हुए.

Related Articles

Back to top button