पश्चिम बंगाल : एसआईआर प्रक्रिया के बाद मतदाता सूची से करीब 91 लाख नाम हटाए गए

कोलकाता. पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (एसआईआर) अभियान के बाद मतदाता सूची से करीब 91 लाख मतदाताओं के नाम हटा दिए गए हैं। निर्वाचन आयोग के आंकड़ों से यह जानकारी मिली है। अंतिम मतदाता सूची के सामने आने के साथ ही 23 अप्रैल को होने वाले विधानसभा चुनावों के पहले चरण से पूर्व एसआईआर राजनीतिक विवाद का मुद्दा बन गया है। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने निर्वाचन आयोग पर राज्य के ”मतुआ, राजबंशी और अल्पसंख्यक समुदाय के सदस्यों को निशाना बनाते हुए उनके नाम हटाने” का आरोप लगाया। वहीं, भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के वरिष्ठ नेता शुभेंदु अधिकारी ने कहा कि ”पश्चिम बंगाल में बांग्लादेशी मुसलमानों के लिए कोई जगह नहीं है।” मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया पूरी होने के बाद राज्य के अंतिम मतदाता आधार की घोषणा अभी बाकी है। हालांकि, उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, पिछले वर्ष अक्टूबर के अंत में 7.66 करोड़ मतदाताओं के आधार पर राज्य में इस समय कुल हटाए गए मतदाताओं का प्रतिशत 11.85 प्रतिशत से अधिक है। एसआईआर प्रक्रिया की शुरुआत से अब तक कुल हटाए गए नामों की अंतिम संख्या 90.83 लाख से थोड़ा अधिक रही।
निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, न्यायिक अधिकारियों द्वारा की गई जांच में इन 60.06 लाख में से 27.16 लाख ‘विचाराधीन’ मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। आंकड़ों से पता चलता है कि 28 फरवरी को एसआईआर के बाद प्रकाशित मसौदा मतदाता सूचियों के बाद न्यायिक जांच के दायरे में आए लगभग 45.22 प्रतिशत नाम हटा दिए गए। वहीं, इस श्रेणी के 32.68 लाख से अधिक मतदाताओं को बरकरार रखते हुए अंतिम सूची में शामिल किया गया है।
आयोग के आंकड़ों से पता चला कि सबसे अधिक नाम मुस्लिम बहुल मुर्शिदाबाद जिले में हटाए गए, जहां न्यायिक जांच के तहत 11.01 लाख नामों में से 4.55 लाख से अधिक नाम मतदाता सूची से हटा दिए गए। इस तरह, जिले में न्यायिक जांच के तहत हटाए गए नामों की संख्या लगभग 41.33 प्रतिशत है। बांग्लादेश की सीमा से लगे उत्तर 24 परगना जिले में भी मतदाता सूची से बड़ी संख्या में नाम हटाए गए। यहां जांच के दायरे में आए 5.91 लाख मतदाताओं में से 3.25 लाख से अधिक मतदाता पात्र नहीं पाए गए। मालदा में न्यायिक जांच के दायरे में आए 8.28 लाख मतदाताओं में से 2.39 लाख से अधिक मतदाताओं के नाम हटा दिए गए। आंकड़ों के मुताबिक, सुनवाई के बाद दक्षिण 24 परगना जिले में हटाए गए नामों की संख्या लगभग 2.23 लाख, पूर्वी बर्धमान में 2.09 लाख और नदिया में 2.98 लाख रही। प्रतिशत के हिसाब से, नदिया और उत्तर 24 परगना जिलों में सुनवाई के बाद हटाए गए नामों की संख्या क्रमशः 77.86 प्रतिशत और 55.08 प्रतिशत रही। माना जाता है कि इन दोनों जिलों में हिंदू शरणार्थी मतुआ समुदाय के सदस्यों की अच्छी खासी संख्या है। कूच बिहार जिले में विचाराधीन 2.38 लाख मतदाताओं में से 50 प्रतिशत से अधिक यानी 1.2 लाख से ज्यादा नाम अंतिम मतदाता सूची से हटा दिए गए। इस जिले को राजबंशी समुदाय का प्रमुख क्षेत्र माना जाता है। कोलकाता दक्षिण में 28,000 से अधिक मतदाताओं के नाम हटाए गए, जहां मुख्यमंत्री ममता बनर्जी का भवानीपुर विधानसभा क्षेत्र मौजूद है। सुनवाई के दौरान हटाए गए नामों का प्रतिशत 36.19 प्रतिशत रहा। कोलकाता उत्तर में जांच के दायरे में आए करीब 39,000 मतदाता मतदान के लिए पात्र नहीं पाए गए, जिससे वहां हटाए गए नामों का प्रतिशत लगभग 64 प्रतिशत रहा। नदिया जिले के चकदाहा में एक रैली को संबोधित करते हुए ममता ने निर्वाचन आयोग और भाजपा पर निशाना साधा। मुख्यमंत्री ने कहा कि जिन लोगों के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं, तृणमूल कांग्रेस उनके साथ खड़ी रहेगी और उन्हें कानूनी सहायता प्रदान करेगी। ममता ने कहा, ”यह भेदभाव क्यों? आप मतुआ, राजबंशी और अल्पसंख्यकों को बाहर कर रहे हैं। क्या आपको लगता है कि लोग यह नहीं समझते?” उन्होंने दावा किया कि मुर्शिदाबाद, मालदा और उत्तर दिनाजपुर जैसे मुस्लिम बहुल जिलों में मतदाताओं के नाम ”जूं की तरह चुन-चुनकर बाहर निकाले गए हैं।” ममता ने दावा किया कि उनके उच्चतम न्यायालय का रुख करने के बाद, निर्णय के लिए विचाराधीन लगभग 60 लाख मामलों में से लगभग 32 लाख नाम सूचियों में बहाल कर दिए गए हैं। आगामी विधानसभा चुनावों को लोगों की पहचान और लोकतांत्रिक अधिकारों की रक्षा की लड़ाई बताते हुए, तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ने मतदाताओं से वोट के जरिये अपना जवाब देने का आग्रह किया। उन्होंने कहा, ”यह चुनाव आपके लोकतंत्र, भाषा और सम्मान को बचाने की लड़ाई है, ताकि कोई भी आपको कभी विदेशी न कह सके।” वहीं, शुभेंदु अधिकारी ने कहा, ”मतदाता सूची से हटाए गए नामों का एक बड़ा हिस्सा ऐसे मतदाताओं का है, जो अब जीवित नहीं हैं। मुख्यमंत्री चाहती हैं कि मृत मतदाता भी वोट दें, इसलिए वह आपत्ति जता रही हैं।” उन्होंने कहा कि बंगाल बांग्लादेशी मुसलमानों को शरण नहीं देगा। शुभेंदु ने कहा कि ”रिकॉर्ड को एक बार और हमेशा के लिए त्रुटिरहित किया जाना चाहिए।”
उन्होंने मुख्यमंत्री पर निशाना साधते हुए कहा, ”चुनाव से पहले कानून-व्यवस्था बिगाड़ने और अराजकता फैलाने के लिए ममता बनर्जी की यह पुरानी चाल है। वह एसआईआर को, जो मतदाता सूची की जांच का एक आजमाया हुआ और कारगर तरीका है, एनआरसी (राष्ट्रीय नागरिक पंजी) कहकर लोगों को गुमराह करने की कोशिश कर रही हैं। लोग इसका विरोध करेंगे और उन्हें इस कोशिश में कामयाब नहीं होने देंगे।” कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने आरोप लगाया, ”भाजपा सत्ता में बने रहने के लिए वैध मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटा देती है। उसने ऐसा सिर्फ बंगाल में ही नहीं, बल्कि पूरे देश में किया है।” आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार, पिछले साल नवंबर में एसआईआर प्रक्रिया शुरू होने के बाद से कुल मतदाताओं में से लगभग 8.3 प्रतिशत यानी 63.66 लाख नाम हटा दिए गए, जिससे मतदाता आधार लगभग 7.66 करोड़ से घटकर करीब 7.04 करोड़ रह गया। 7.04 करोड़ के मतदाता आधार में 60.06 लाख से अधिक मतदाता ऐसे थे, जिन्हें विचाराधीन श्रेणी में रखा गया था। अंतिम मतदाता सूची से नाम हटाए जाने के बाद मतदाताओं के पास उच्चतम न्यायालय के आदेशों के तहत राज्य में विशेष रूप से गठित न्यायाधिकरणों में जाने का विकल्प है, लेकिन अभी तक यह स्पष्ट नहीं है कि न्यायाधिकरण के न्यायाधीशों द्वारा पात्र पाए गए मतदाता आगामी चुनावों में अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर पाएंगे या नहीं।



