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चे ग्वेरा को मरवाया, भारत के दोस्त कास्त्रो को भी बनाया निशाना; क्यूबा से क्यों पंगा लेता है US?

फ्लोरिडा (अमेरिका) के तट से महज 90 मील दूर एक छोटा सा द्वीपीय देश है- क्यूबा। भौगोलिक रूप से यह अमेरिका के इतना करीब है कि एक तेज रफ्तार नाव से कुछ घंटों में पहुंचा जा सकता है, लेकिन वैचारिक रूप से दोनों के बीच की दूरी इतनी है जिसे पिछले छह दशकों में नहीं पाटा जा सका। हालिया घटनाक्रमों में क्यूबा फिर चर्चा में है। वेनेजुएला में सैन्य कार्रवाई के बाद अमेरिका ने वहां के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को गिरफ्तार कर लिया। अब राष्ट्रपति ने क्यूबा को भी इसी तरह की चेतावनी दी है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर दुनिया की महाशक्ति अमेरिका इस छोटे से ‘चीनी के कटोरे’ से इतना क्यों डरता है या नफरत करता है? इस सवाल का जवाब इतिहास के उन पन्नों में छिपा है जहां चे ग्वेरा का खून गिरा और भारत के परम मित्र रहे फिदेल कास्त्रो ने अमेरिका की नाक के नीचे समाजवाद का झंडा गाड़ा। आइए इसे विस्तार से समझते हैं। वेनेजुएला में हुए अमेरिकी हमले में 32 क्यूबाई सुरक्षा अधिकारी मारे गए। दोनों देशों की सरकारों के बीच इतने करीबी रिश्ते हैं कि क्यूबाई सैनिक और सुरक्षा एजेंट अक्सर वेनेजुएला के राष्ट्रपति के अंगरक्षक होते थे और वेनेजुएला के पेट्रोलियम आयात से क्यूबा की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को कई वर्षों तक सहारा मिलता रहा है। अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने साफ तौर पर चेतावनी दी है कि मादुरो को हटाने से दशकों पुराने एक और लक्ष्य को हासिल करने में मदद मिलेगी और वह है क्यूबा की सरकार को नुकसान पहुंचाना। ट्रंप ने साफ कहा है कि क्यूबा की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था मादुरो की विदाई के बाद और अधिक बदतर हो जाएगी। वेनेजुएला की जनसंख्या क्यूबा से तीन गुना अधिक है। ट्रंप का मानना है कि वेनेजुएला पर दबाव बनाकर या उसकी सरकार बदलकर क्यूबा को आर्थिक रूप से इतना कमजोर किया जा सकता है कि वहां की कम्युनिस्ट व्यवस्था अपने आप ढह जाए, बिना सीधे सैन्य हस्तक्षेप के। साथ ही, विदेश मंत्री मार्को रुबियो (जो क्यूबाई मूल के हैं) जैसे क्यूबा-विरोधी सख्त रुख वाले लोग ट्रंप की टीम में हैं, जो लंबे समय से क्यूबा में रेजीम चेंज की पक्षधर रहे हैं। यह सब अमेरिकी हितों, क्षेत्रीय प्रभाव और पुरानी दुश्मनी को मजबूत करने की रणनीति का हिस्सा है। इस दुश्मनी को समझने के लिए हमें 1959 से पहले के दौर में जाना होगा। उस समय क्यूबा पर तानाशाह फुलसेंसियो बतिस्ता का राज था। बतिस्ता अमेरिका का खास दोस्त था। उस दौर में हवाना (क्यूबा की राजधानी) अमेरिकी रईसों और माफियाओं का ‘प्लेग्राउंड’ था। क्यूबा की चीनी मिलों, खदानों और यूटिलिटीज पर अमेरिकी कंपनियों का कब्जा था। आम क्यूबन गरीबी में जी रहा था, जबकि अमेरिकी वहां जुआ खेलने और छुट्टियां मनाने जाते थे। अमेरिका को यह व्यवस्था पसंद थी, लेकिन क्यूबा की जनता को नहीं। अमेरिकी कंपनियां- जैसे यूनाइटेड फ्रूट कंपनी क्यूबा की अर्थव्यवस्था पर कब्जा जमाए हुए थीं। चीनी उद्योग, खदानें, कैसीनो, होटल सब अमेरिकी पूंजी पर चलते थे। लेकिन गरीबी, भ्रष्टाचार और असमानता चरम पर थी। इसी बीच फिदेल कास्त्रो, उनके भाई राउल कास्त्रो और अर्जेंटीना के डॉक्टर अर्नेस्टो ‘चे’ ग्वेरा का आगमन हुआ। सोवियत संघ से दोस्ती: अमेरिका ने जवाब में चीनी आयात कोटा घटाया (क्यूबा की अर्थव्यवस्था का 80% चीनी पर निर्भर था)। कास्त्रो ने शीत युद्ध में अमेरिका के सबसे बड़े दुश्मन सोवियत संघ (USSR) से हाथ मिला लिया। उन्होंने जवाब में सोवियत संघ से तेल खरीदा। लेकिन अमेरिकी कंपनियों ने सोवियत तेल रिफाइन करने से इनकार किया। तभी कास्त्रो ने रिफाइनरी ही जब्त कर ली। यहीं से अमेरिका ने तय कर लिया कि उसकी नाक के नीचे (Western Hemisphere में) कम्युनिज्म का यह पौधा पनपने नहीं दिया जाएगा। अर्नेस्तो ‘चे’ ग्वेरा 20वीं सदी के सबसे प्रभावशाली और विवादित चेहरों में से एक हैं। एक डॉक्टर से लेकर गुरिल्ला कमांडर बनने तक का उनका सफर बेहद रोमांचक और खूनी रहा है। चे ग्वेरा का जन्म 14 जून 1928 को अर्जेंटीना के रोसारियो में एक मध्यमवर्गीय परिवार में हुआ था। उन्हें बचपन से ही अस्थमा (दमा) की गंभीर बीमारी थी, लेकिन इसके बावजूद वे रग्बी खेलते थे और शारीरिक रूप से बहुत सक्रिय थे। उन्होंने ब्यूनस आयर्स यूनिवर्सिटी से मेडिसिन (डॉक्टरी) की पढ़ाई की थी। वे संपन्न परिवार से थे, लेकिन उनका झुकाव हमेशा गरीबों की समस्याओं की ओर रहा। 1951 में, अपनी पढ़ाई पूरी करने से ठीक पहले, चे ने अपने दोस्त अल्बर्टो ग्रेनाडो के साथ पूरे दक्षिण अमेरिका की मोटरसाइकिल यात्रा पर निकलने का फैसला किया। इस यात्रा में उन्होंने लैटिन अमेरिका के देशों में भयानक गरीबी, भूख और बीमारी (विशेषकर कुष्ठ रोगियों की दशा) देखी। उन्होंने महसूस किया कि यह गरीबी ‘पूंजीवाद’ और ‘साम्राज्यवाद’ के कारण है। इस यात्रा ने एक डॉक्टर के हाथ से स्टेथोस्कोप छीनकर बन्दूक थमा दी। उन्होंने ठान लिया कि इन समस्याओं का हल केवल ‘सशस्त्र क्रांति’ है। यात्रा के बाद चे ग्वाटेमाला गए, जहां अमेरिका द्वारा वहां की चुनी हुई सरकार को गिराते देख उनकी नफरत अमेरिका के प्रति और बढ़ गई। बाद में वे मैक्सिको गए, जहां उनकी मुलाकात फिदेल कास्त्रो से हुई। फिदेल कास्त्रो क्यूबा के तानाशाह ‘फुलगेंशियो बतिस्ता’ को हटाना चाहते थे। चे ग्वेरा उनके ’26 जुलाई आंदोलन’ में शामिल हो गए। 1956 में 82 क्रांतिकारियों के साथ वे ‘ग्रानमा’ नामक एक छोटी नाव में क्यूबा पहुंचे। शुरुआत में ही उनकी सेना पर हमला हुआ और सिर्फ 12-20 लोग ही बचे, जिनमें चे और फिदेल शामिल थे। वे ‘सिएरा मेस्ट्रा’ के जंगलों में छिप गए और वहां से गुरिल्ला युद्ध शुरू किया। सांता क्लारा की लड़ाई चे ग्वेरा का सबसे प्रसिद्ध सैन्य कारनामा था। 1958 में, चे ने अपने छोटे से दल के साथ बतिस्ता की हथियारों से लदी एक पूरी ट्रेन को पटरी से उतार दिया और शहर पर कब्जा कर लिया। इस हार के बाद बतिस्ता देश छोड़कर भाग गया और क्रांति सफल हुई। क्रांति के बाद चे को क्यूबा की नई सरकार में अहम पद मिले। उद्योग मंत्री और बैंक प्रमुख बने। उन्होंने क्यूबा की अर्थव्यवस्था को अमेरिका से अलग कर सोशलिज्म की तरफ मोड़ा। ला कबाना- चे के जीवन का सबसे विवादित हिस्सा है। उन्हें ला कबाना किले का प्रभारी बनाया गया, जहां उन्होंने बतिस्ता के समर्थकों और “गद्दारों” के लिए फायरिंग स्क्वाड द्वारा मौत की सजाओं की निगरानी की। आलोचक उन्हें इसके लिए कसाई कहते हैं, जबकि समर्थक इसे क्रांतिकारी न्याय कहते हैं। चे ग्वेरा सिर्फ एक क्रांतिकारी नहीं थे, वे अमेरिका विरोधी विचारधारा का वैश्विक चेहरा बन चुके थे। वे लैटिन अमेरिका के अन्य देशों में क्रांति फैलाना चाहते थे। 1967 में चे ग्वेरा बोलीविया के जंगलों में छापामार युद्ध की तैयारी कर रहे थे। अमेरिका की खुफिया एजेंसी CIA को चे की लोकेशन का पता चला। उन्होंने बोलीविया की सेना को ट्रेन किया और चे को पकड़ने के लिए एक विशेष अभियान चलाया। फेलिक्स रॉड्रिगेज- यह नाम याद रखना जरूरी है। यह वो क्यूबन-अमेरिकी CIA एजेंट था जो चे ग्वेरा के अंतिम समय में वहां मौजूद था। 9 अक्टूबर 1967 को चे को पकड़ने के बाद बोलीविया के एक स्कूल में रखा गया। कहा जाता है कि अमेरिका उन्हें जिंदा पकड़कर पूछताछ करना चाहता था, लेकिन बोलीविया की सरकार उन्हें मारना चाहती थी ताकि वे जेल से ‘हीरो’ न बन सकें। जब सार्जेंट मारियो टेरान उन्हें मारने आया, तो चे के आखिरी शब्द थे- ‘मुझे पता है तुम मुझे मारने आए हो। गोली चलाओ कायर, तुम सिर्फ एक आदमी को मारने जा रहे हो (विचार को नहीं)।’ चे को मार दिया गया, लेकिन उनकी तस्वीर दुनिया भर में विद्रोह का प्रतीक बन गई। अल्बर्टो कोर्डा द्वारा खींची गई उनकी फोटो (जिसमें वे बेरेट टोपी पहने हैं और दूर देख रहे हैं) दुनिया की सबसे प्रसिद्ध तस्वीरों में से एक है। युवाओं के लिए वे अन्याय के खिलाफ लड़ने, सादगी और बलिदान के प्रतीक हैं। उनकी टी-शर्ट पहनना ‘सिस्टम’ के खिलाफ गुस्से का इजहार माना जाता है। चे ग्वेरा को मारने में अमेरिका सफल रहा, लेकिन फिदेल कास्त्रो उनके गले की हड्डी बन गए। कास्त्रो भारत के बहुत करीबी दोस्त थे। क्यूबा के क्रांतिकारी नेता फिदेल कास्त्रो और भारत के बीच का रिश्ता सिर्फ दो देशों के कूटनीतिक संबंधों तक सीमित नहीं था। यह रिश्ता आपसी सम्मान, भाईचारे और ‘इमोशनल बॉन्ड’ का था। फिदेल कास्त्रो भारत को बहुत मानते थे और उन्होंने जवाहरलाल नेहरू से लेकर इंदिरा गांधी और अटल बिहारी वाजपेयी तक, हर भारतीय प्रधानमंत्री के साथ गर्मजोशी भरा रिश्ता रखा। लेकिन अमेरिका के लिए कास्त्रो दुश्मन नंबर 1 थे। कास्त्रो की सुरक्षा टीम के प्रमुख फैबियन एस्कलांटे का दावा है कि CIA ने कास्त्रो को मारने के लिए 638 बार प्रयास किए। इनमें से कुछ तरीके बेहद अजीबोगरीब थे: विस्फोटक सिगार: क्यूबा अपनी सिगार के लिए विश्व प्रसिद्ध है। कास्त्रो को सिगार बहुत पसंद था, इसलिए ऐसे सिगार बनाए गए जो मुंह में फट जाएं। जहरीला वेटसूट: कास्त्रो को डाइविंग का शौक था, इसलिए उनके डाइविंग सूट में जानलेवा फंगस लगाने की योजना बनी। पुरानी प्रेमिका का इस्तेमाल: CIA ने कास्त्रो की एक पुरानी प्रेमिका, मारिता लोरेंज, को उन्हें जहर देने के लिए भेजा। लेकिन कास्त्रो को पता चल गया। उन्होंने अपनी पिस्तौल निकालकर मारिता को दी और कहा- लो, मुझे मार दो। मारिता ऐसा नहीं कर सकीं।

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