वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था मजबूत

वित्त वर्ष 2027 में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट 7 प्रतिशत रहने का अनुमान
पिछले एक साल में ग्रामीण इलाकों में महंगाई शहरी क्षेत्रों से कम रही
नई दिल्ली। केंद्रीय वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण ने गुरुवार को संसद के बजट सत्र के दौरान राज्यसभा में आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 पेश किया। इसके तुरंत बाद सदन की कार्यवाही स्थगित कर दी गई। राज्यसभा की कार्यवाही अब एक फरवरी को लोकसभा में केंद्रीय बजट 2026-27 की प्रस्तुति के एक घंटे बाद शुरू होगी।
आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 में चालू वित्त वर्ष के दौरान देश की आर्थिक स्थिति का आधिकारिक आकलन प्रस्तुत किया गया है। इसमें आर्थिक विकास, प्रमुख संकेतकों, उपलब्धियों और अर्थव्यवस्था के समक्ष मौजूद चुनौतियों का उल्लेख किया गया है, साथ ही अगले वित्त वर्ष के लिए आर्थिक परिदृश्य का भी खाका पेश किया गया है।
यह दस्तावेज वित्त मंत्रालय के आर्थिक कार्य विभाग के अंतर्गत आर्थिक प्रभाग द्वारा तैयार किया गया है, जिसे मुख्य आर्थिक सलाहकार (सीईए) की निगरानी में अंतिम रूप दिया गया। सर्वेक्षण में अप्रैल 2025 से मार्च 2026 की अवधि के दौरान विभिन्न क्षेत्रों के प्रदर्शन और नीतिगत संकेतों को समाहित किया गया है।
पेश किए गए इकोनॉमिक सर्वे 2025-26 में भारत की जीडीपी ग्रोथ रेट यानी आर्थिक विकास दर अगले वित्त वर्ष 2027 में 7.0 प्रतिशत रहने का अनुमान लगाया गया है, जो तीन साल पहले 6.5 प्रतिशत थी। सर्वे के अनुसार, देश में लगातार हो रहे घरेलू सुधार और सरकारी निवेश की वजह से, वैश्विक चुनौतियों के बावजूद भारत की अर्थव्यवस्था की अंदरूनी ताकत बढ़ी है।
देश में पिछले एक साल के दौरान ग्रामीण इलाकों में महंगाई शहरी इलाकों की तुलना में कम रही है। इससे ग्रामीण क्षेत्र में आर्थिक दबाव में कमी आई है। पिछले दो वर्षों 2023 और 2024 में ग्रामीण महंगाई शहरी महंगाई से ज्यादा थी, लेकिन 2025 में खाने-पीने की चीजों की कीमतें घटने से इसमें कमी आ गई।
सर्वेक्षण में बताया गया है कि ज्यादातर राज्यों में खुदरा महंगाई भारतीय रिजर्व बैंक के 2-6 प्रतिशत के सहनशीलता दायरे (टॉलरेंस बैंड) के अंदर रही। इस दौरान केवल केरल और लक्षद्वीप में खुदरा महंगाई 6 प्रतिशत से ऊपर गई। दिल्ली और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में महंगाई राष्ट्रीय औसत से कम रही, जबकि दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों में औसत से ज्यादा दर्ज की गई।
सर्वेक्षण में राज्य-वार उपभोक्ता मूल्य सूचकांक(सीपीआई) महंगाई डेटा का भी विश्लेषण किया गया है। जनवरी 2014 से दिसंबर 2025 तक के मासिक आंकड़ों के आधार पर यह पाया गया कि राज्यों में महंगाई का अंतर पूरी तरह अस्थायी नहीं था। कई बार राष्ट्रीय औसत से अलग स्थिति एक महीने से ज्यादा समय तक बनी रही। दक्षिण और पूर्वोत्तर के राज्यों में महंगाई लगातार राष्ट्रीय औसत से ऊपर रही, जबकि दिल्ली और हिमाचल प्रदेश जैसे राज्यों में महंगाई अक्सर औसत से कम रही।
सर्वेक्षण में बताया गया कि जिन राज्यों में मजदूरी दर राष्ट्रीय औसत से अधिक है, वहां महंगाई भी ज्यादा रही। साथ ही औद्योगिक उत्पादन की हिस्सेदारी का महंगाई पर उल्टा असर दिखा, यानी विनिर्माण क्षेत्र की कार्यकुशलता ने कीमतों पर दबाव कम किया। सर्वेक्षण में बताया गया कि जीएसटी लागू होने से राज्यों के बीच महंगाई के अंतर पर कोई खास असर नहीं पड़ा।
सर्वेक्षण में बताया गया है कि 1990 से भारत ने अपनी मातृ मृत्यु दर, पांच साल से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर, नवजात मृत्यु दर में काफी कमी दर्ज की है। आर्थिक सर्वेक्षण के अनुसार, मोटापे की समस्या से निपटने के लिए बहुआयामी रणनीति की आवश्यकता है। 2019-21 के राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (एनएफएचएस) की रिपोर्ट के अनुसार, 24 प्रतिशत भारतीय महिलाएं और 23 प्रतिशत भारतीय पुरुष अधिक वजन या मोटापे से ग्रस्त हैं। इससे भी अधिक चिंताजनक बात यह है कि पांच वर्ष से कम आयु के बच्चों में अधिक वजन का प्रचलन 2015-16 में 2.1 प्रतिशत से बढ़कर 2019-21 में 3.4 प्रतिशत हो गया है।
सर्वेक्षण अल्ट्रा-प्रोसेस्ड खाद्य पदार्थों की समस्या से निपटने के लिए आहार और नीतिगत हस्तक्षेपों पर जोर दिया गया है। सर्वेक्षण से पता चलता है कि आहार संबंधी सुधारों को सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकता के रूप में लिया जाना चाहिए। भारत यूपीएफ (यूपी) बिक्री के लिए सबसे तेजी से बढ़ते बाजारों में से एक है। 2009 से 2023 तक इसमें 150 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि हुई है।
सर्वे प्रभावी प्रबंधन के लिए स्थानीय रूप से उत्पादित खाद्य पदार्थों, पारंपरिक खाद्य पदार्थों को लोकप्रिय बनाने और आयुष (जैसे, योग को बढ़ावा देना) जैसी पारंपरिक प्रथाओं का उपयोग करने की आवश्यकता को दशार्ता है।
सर्वेक्षण में बच्चों में डिजिटल लत की बढ़ती समस्या पर भी प्रकाश डाला गया है। डिजिटल लत ध्यान भटकाने, नींद की कमी और एकाग्रता में कमी के कारण शैक्षणिक प्रदर्शन और कार्यस्थल उत्पादकता को नकारात्मक रूप से प्रभावित करती है। यह सामाजिक साख को भी कम करती है।
इसके अलावा सर्वे में सोशल मीडिया को लेकर चिंता जाहिर की गई है। इसमें कहा गया है कि इसकी लत चिंता, अवसाद, कम आत्मसम्मान और साइबरबुलिंग के तनाव से गहराई से जुड़ी हुई है। भारतीय युवाओं को प्रभावित करने वाली अन्य समस्याओं में अत्यधिक स्क्रॉलिंग, सामाजिक तुलना और गेमिंग विकार शामिल हैं। ये समस्याएं नींद में खलल, आक्रामकता, सामाजिक अलगाव और अवसाद का कारण बनती हैं, जिनमें किशोर विशेष रूप से संवेदनशील होते हैं।



