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छूट में खेल: बैंक-एनबीएफसी पर सीएजी सख्त,2,378 मामलों की जांच में गड़बड़ियां उजागर

  • खराब ऋण, संदिग्ध प्रावधान और विशेष कोष में अनियमितता
  • नियमों में तालमेल और सख्त निगरानी की सिफारिश

नई दिल्ली। सीएजी की ताजा रिपोर्ट ने देश की बैंकिंग और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्नचिह्न लगा दिया है। संसद में प्रस्तुत इस रिपोर्ट में कर छूट और कटौतियों के दावों में व्यापक अनियमितताओं का खुलासा हुआ है, जिनका संभावित प्रभाव लगभग 74,766 करोड़ रुपये तक आंका गया है। यह स्थिति न केवल राजस्व के दृष्टिकोण से चिंताजनक है, बल्कि वित्तीय अनुशासन और संस्थागत पारदर्शिता के लिए भी चुनौती बनकर उभरी है।

सीएजी ने जून 2023 तक के 2,378 मामलों का नमूना परीक्षण किया, जिसमें 1,847 अवलोकन दर्ज किए गए। इनमें से 671 मामले व्यवस्था संबंधी कमजोरियों से जुड़े पाए गए, जबकि 533 मामलों में नियमों के अनुपालन में स्पष्ट चूक सामने आई। जांच के दौरान यह तथ्य उभरकर सामने आया कि कर नियमों और बैंकिंग नियामक प्रावधानों के बीच पर्याप्त समन्वय का अभाव है, जिसका लाभ उठाकर कई संस्थाओं ने कर देनदारी को कम दिखाने का प्रयास किया।

रिपोर्ट में विशेष रूप से खराब ऋणों, संदिग्ध ऋणों के लिए किए गए प्रावधानों और विशेष कोष में धन हस्तांतरण से संबंधित मामलों में अनियमितताओं को रेखांकित किया गया है। कई संस्थानों ने इन मदों में अनुचित कटौतियों का दावा किया, जिससे कर योग्य आय कृत्रिम रूप से कम दिखाई गई। इसके अलावा, वित्तीय अभिलेखों के रखरखाव में असंगतता और समय पर विवरण प्रस्तुत न करने जैसी कमियां भी उजागर हुईं, जिसने निगरानी व्यवस्था को कमजोर किया।सीएजी ने पाया कि गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं के मामले में कर प्रावधानों को लेकर अधिक अस्पष्टता है, जिससे पारदर्शिता प्रभावित होती है।

इसके साथ ही, भारतीय रिजर्व बैंक के दिशा निर्देश और कर नियमों के बीच तालमेल की कमी ने समस्या को और जटिल बना दिया है। रिपोर्ट में यह स्पष्ट किया गया है कि उल्लिखित राशि प्रत्यक्ष राजस्व हानि नहीं, बल्कि संभावित प्रभाव का संकेत है। इसके बावजूद, यदि समय रहते सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो इसका असर देश की वित्तीय साख और निवेशकों के विश्वास पर पड़ सकता है।

सीएजी ने केंद्र सरकार को सुझाव दिया है कि कर नियमों और नियामक प्रावधानों के बीच स्पष्टता और सामंजस्य सुनिश्चित किया जाए। साथ ही, बैंकों और गैर-बैंकिंग वित्तीय संस्थाओं के लिए सख्त निगरानी व्यवस्था विकसित करने, नियमित लेखा परीक्षण को प्रभावी बनाने और जवाबदेही तय करने की आवश्यकता पर बल दिया गया है।

वित्त मंत्रालय और भारतीय रिजर्व बैंक ने रिपोर्ट के निष्कर्षों पर गंभीरता से विचार करने और आवश्यक सुधारात्मक कदम उठाने के संकेत दिए हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि आंतरिक नियंत्रण प्रणाली को मजबूत कर और पारदर्शिता बढ़ाकर इस तरह की अनियमितताओं को काफी हद तक रोका जा सकता है। समग्र रूप से यह रिपोर्ट वित्तीय क्षेत्र के लिए एक चेतावनी के रूप में देखी जा रही है। स्पष्ट है कि कर अनुपालन और निगरानी तंत्र में सुधार किए बिना वित्तीय स्थिरता और राजस्व संरक्षण सुनिश्चित करना संभव नहीं होगा।

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