आजादी के 80वें साल में सवालों की आजादी

आजादी के 80वें साल में लाल किले की प्राचीर से देश के सामने विकसित भारत का बड़ा सपना रखा गया। 2047 तक भारत को विकसित राष्ट्र बनाने का संकल्प, आत्मनिर्भरता, मैन्युफैक्चरिंग, कृषि, तकनीक और इनोवेशन, रक्षा, ग्रीन इकोनॉमी और सॉफ्ट पावर की सप्तधारा, युवाओं को एआई प्रशिक्षण, मुफ्त ऑनलाइन कोचिंग, सेमीकंडक्टर से लेकर परमाणु ऊर्जा तक आत्मनिर्भरता का लक्ष्य—निस्संदेह यह एक ऐसे भारत की तस्वीर है जो दुनिया में अपनी ताकत और पहचान बढ़ाना चाहता है। बड़े सपने देखने में कोई बुराई नहीं, बल्कि राष्ट्रों को आगे बढ़ाने के लिए बड़े सपने जरूरी होते हैं। लेकिन आजादी के 80वें वर्ष में एक सवाल विकास की इन तमाम उपलब्धियों और महत्वाकांक्षाओं के बीच कहीं ज्यादा महत्वपूर्ण हो जाता है, क्या विकसित भारत केवल आर्थिक, तकनीकी और सामरिक ताकत से बनेगा या लोकतांत्रिक सहिष्णुता भी उसकी पहचान होगी?
प्रधानमंत्री ने नक्सलवाद के खिलाफ सरकार की सफलता का उल्लेख करते हुए हथियारबंद नक्सलवाद के बाद ‘दिमागी नक्सल की चुनौती से सावधान किया। नक्सली हिंसा का समर्थन कोई लोकतांत्रिक मूल्य नहीं हो सकता। बंदूक के बल पर संविधान और लोकतंत्र को चुनौती देने वालों के खिलाफ कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन चिंता तब पैदा होती है जब नक्सलवाद की परिभाषा बंदूक से निकलकर विचारों तक पहुंचने लगती है। असहमति को ‘दिमागी नक्सल, विरोध को राष्ट्र-विरोध और सरकार से सवाल को किसी साजिश का हिस्सा मान लेने की प्रवृत्ति लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है।
आज की जेनजी अपने सवालों के साथ खड़ी है। उसे रोजगार चाहिए, परीक्षा व्यवस्था में ईमानदारी चाहिए, शिक्षा में अवसर चाहिए, संस्थाओं पर भरोसा चाहिए और अपने भविष्य को लेकर स्पष्टता चाहिए। यह पीढ़ी सोशल मीडिया पर सवाल करती है, अपनी बात कहती है, विरोध करती है और जवाब मांगती है। इसे राष्ट्र निर्माण की सबसे बड़ी शक्ति भी कहा जाता है और जब यही युवा सत्ता की नीतियों पर सवाल उठाता है तो उसकी नीयत पर शक भी किया जाता है। यह विरोधाभास दूर करना होगा। युवा अगर सरकार की किसी नीति का विरोध करता है तो पहले उसके सवाल का जवाब दिया जाना चाहिए, उसके चरित्र का प्रमाणपत्र नहीं मांगा जाना चाहिए।
विरोध और विद्रोह में फर्क है। असहमति और अराजकता में फर्क है। आलोचना और राष्ट्र-विरोध में फर्क है। लोकतंत्र की खूबसूरती ही यही है कि सरकार के साथ खड़े होने का अधिकार जितना नागरिक को है, उतना ही सरकार से सवाल पूछने का भी। सरकार मजबूत होनी चाहिए, लेकिन नागरिक की आवाज को मजबूत सरकार के लिए खतरा नहीं समझा जाना चाहिए। लोकतंत्र में सवाल सरकार को कमजोर नहीं करते, बल्कि उसे बेहतर बनाते हैं।
आजादी के 80वें वर्ष में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिकाÓ की स्मृति और उसके साथ कांग्रेस को विभाजन के लिए जिम्मेदार ठहराने की राजनीतिक बहस भी इसी संदर्भ में देखी जानी चाहिए। विभाजन भारत के इतिहास की भयावह मानवीय त्रासदी थी। लाखों लोग मारे गए, करोड़ों विस्थापित हुए, परिवार उजड़ गए और पीढिय़ों तक उस पीड़ा का असर रहा। उस त्रासदी को याद करना जरूरी है, क्योंकि इतिहास को भूलने वाला समाज अपनी गलतियों को दोहरा सकता है। लेकिन इतिहास को याद करना और इतिहास को राजनीतिक हथियार बनाना दो अलग बातें हैं।
विभाजन के लिए केवल एक राजनीतिक दल को जिम्मेदार ठहरा देना इतिहास को बहुत छोटा कर देना है। इसके पीछे औपनिवेशिक सत्ता की नीतियां थीं, सांप्रदायिक राजनीति का उभार था, मुस्लिम लीग की पाकिस्तान की मांग थी, तत्कालीन राजनीतिक परिस्थितियां थीं, कांग्रेस नेतृत्व की अपनी गलतियां और मजबूरियां थीं और सत्ता हस्तांतरण की जल्दबाजी भी थी। इतिहास का सच बहुआयामी होता है। उसे चुनावी भाषण की सुविधा के अनुसार एक खलनायक और एक नायक में बांट देना आने वाली पीढ़ी के साथ न्याय नहीं होगा। विभाजन की विभीषिका को याद करने का उद्देश्य यह होना चाहिए कि देश फिर कभी नफरत और अविश्वास की उस स्थिति में न पहुंचे, न कि पुरानी त्रासदी के सहारे वर्तमान के राजनीतिक विभाजन को और गहरा किया जाए।
वंदे मातरम को लेकर उठे विवाद ने भी इसी बहस को एक नया मोड़ दिया है। स्वतंत्रता आंदोलन में वंदे मातरम की भूमिका ऐतिहासिक है। यह करोड़ों भारतीयों की भावनाओं और स्वतंत्रता संघर्ष की स्मृति से जुड़ा हुआ है। इसका सम्मान होना चाहिए और किसी भी राष्ट्रीय प्रतीक या राष्ट्रीय भावना का जानबूझकर अपमान उचित नहीं हो सकता। लेकिन स्वतंत्रता दिवस पर एक राजनीतिक आयोजन में वंदे मातरम की प्रस्तुति को लेकर उठे विवाद में आरोपों के आधार पर तत्काल देशभक्ति और राष्ट्रविरोध का फैसला सुना देना भी उचित नहीं है। यदि कोई कानून का उल्लंघन हुआ है तो जांच हो, तथ्य सामने आएं और कानून अपना काम करे। राजनीति को अदालत का स्थान नहीं लेना चाहिए।
वंदे मातरम किसी एक दल की संपत्ति नहीं है। जिस तरह तिरंगा किसी पार्टी का झंडा नहीं है, उसी तरह देशभक्ति भी किसी राजनीतिक दल की निजी मिल्कियत नहीं हो सकती। देशभक्ति का अर्थ यह नहीं कि जो सरकार के साथ है वही देशभक्त है और जो सरकार से सवाल करता है वह राष्ट्रविरोधी है। भारत की स्वतंत्रता का इतिहास स्वयं इस बात का प्रमाण है कि आजादी की लड़ाई में अनेक विचारधाराएं, अनेक मत और अनेक रास्ते मौजूद थे। बहस थी, मतभेद थे, संघर्ष था, लेकिन लक्ष्य भारत की आजादी था।
इसलिए आजादी के 80वें साल में हमें यह तय करना होगा कि हम राष्ट्रवाद को कितना बड़ा बनाना चाहते हैं। यदि राष्ट्रवाद इतना छोटा हो जाए कि उसमें आलोचना के लिए जगह न बचे तो वह राष्ट्रवाद नहीं, राजनीतिक आग्रह बन जाएगा। अगर इतिहास इतना संकीर्ण हो जाए कि उसमें केवल अपने पक्ष के नायक दिखाई दें और दूसरे पक्ष के योगदान मिटा दिए जाएं तो वह इतिहास नहीं, राजनीतिक आख्यान बन जाएगा। और यदि विकास इतना संकीर्ण हो जाए कि उसमें नागरिक स्वतंत्रता और संस्थाओं की विश्वसनीयता का सवाल ही न हो तो वह विकास अधूरा होगा।
प्रधानमंत्री ने युवाओं को विकसित भारत का सबसे बड़ा लाभार्थी और सबसे बड़ा साधक बताया है। यह बात जितनी सही है, उतनी ही महत्वपूर्ण यह भी है कि उसी युवा को सवाल पूछने की पूरी स्वतंत्रता मिले। जिस देश के नौजवान एआई, अंतरिक्ष, सेमीकंडक्टर, स्टार्टअप और नई तकनीक में दुनिया का नेतृत्व करने का सपना देख रहे हैं, उन्हें विचारों में भी स्वतंत्र होना चाहिए। नई पीढ़ी को केवल निर्देश नहीं, संवाद चाहिए।
भारत को 2047 में विकसित राष्ट्र बनना है तो उसे केवल दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में स्थान नहीं बनाना है, बल्कि दुनिया के सबसे परिपक्व लोकतंत्रों में भी अपनी जगह मजबूत करनी है। सड़कें, कारखाने, बंदरगाह, सेमीकंडक्टर, परमाणु ऊर्जा, एआई और रक्षा शक्ति देश की भौतिक ताकत बढ़ाएंगे, लेकिन नागरिक का भरोसा, संविधान की गरिमा, संस्थाओं की स्वतंत्रता और असहमति के प्रति सम्मान देश की लोकतांत्रिक ताकत तय करेंगे।
आजादी का अर्थ केवल विदेशी शासन से मुक्ति नहीं था। आजादी का अर्थ भय से मुक्ति भी था। सवाल पूछने की आजादी, बोलने की आजादी, लिखने की आजादी और सत्ता से असहमत होने की आजादी भी उसी स्वतंत्रता की विरासत है। इस विरासत को बचाना उतना ही जरूरी है जितना सीमाओं की रक्षा करना।
विभाजन हमें चेताता है कि नफरत समाज को तोड़ सकती है। नक्सलवाद बताता है कि हिंसा लोकतंत्र का विकल्प नहीं हो सकती। वंदे मातरम हमें स्वतंत्रता संघर्ष की साझी विरासत की याद दिलाता है और जेनजी हमें बता रही है कि नई पीढ़ी अपने भविष्य को लेकर सवाल पूछेगी। इन चारों संदेशों को साथ रखकर देखें तो आज के भारत की सबसे बड़ी जरूरत यही दिखाई देती है कि सत्ता और समाज के बीच संवाद बना रहे, विरोध को दुश्मनी न समझा जाए और देशभक्ति को राजनीतिक प्रमाणपत्र में न बदला जाए।
देश सरकार से बड़ा है, लोकतंत्र सत्ता से बड़ा है और संविधान किसी भी राजनीतिक दल से बड़ा है। आजादी के 80वें वर्ष में यही हमारी सबसे बड़ी परीक्षा है कि हम आर्थिक रूप से शक्तिशाली भारत के साथ ऐसा लोकतांत्रिक भारत भी बनाएं जहां सरकार से सवाल पूछने वाला नागरिक यह महसूस करे कि वह देश का विरोध नहीं कर रहा, बल्कि देश को बेहतर बनाने की प्रक्रिया में अपनी भूमिका निभा रहा है।
वंदे मातरम की गूंज तभी सार्थक होगी जब उसमें हर भारतीय की आवाज सुनाई दे। तिरंगा तभी हर मन में होगा जब उसके नीचे खड़े हर नागरिक को बराबर सम्मान और अपनी बात कहने का अधिकार होगा। और विकसित भारत तभी सचमुच विकसित भारत कहलाएगा जब उसकी शक्ति केवल उसकी अर्थव्यवस्था और हथियारों में नहीं, बल्कि उसके नागरिकों के आत्मविश्वास और लोकतंत्र की मजबूती में भी दिखाई देगी।



