पीएसीएल मामले में पूर्व बीएसएफ अधिकारी को सुप्रीम कोर्ट से राहत नहीं

- हाईकोर्ट के आदेश में दखल से इनकार, गिरफ्तारी की आशंका पर मांगी थी राहत
बिलासपुर। पीएसीएल लिमिटेड से जुड़े कथित आर्थिक अपराध के मामले में पूर्व बीएसएफ डिप्टी कमांडेंट नरिंदर सिंह मेहता को सुप्रीम कोर्ट से भी राहत नहीं मिली। सुप्रीम कोर्ट ने छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के 23 जून 2026 के आदेश में हस्तक्षेप करने से इनकार करते हुए मेहता की विशेष अनुमति याचिका (एसएलपी) खारिज कर दी।
68 वर्षीय मेहता ने गिरफ्तारी की आशंका जताते हुए हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी। उनका कहना था कि न तो एफआईआर में उनका नाम है और न ही 17 सितंबर 2021 को दाखिल आरोपपत्र में उन्हें आरोपी बनाया गया है। हाईकोर्ट ने उनकी याचिका खारिज करते हुए कहा था कि केवल भविष्य में गिरफ्तारी या पूरक आरोपपत्र में नाम शामिल होने की आशंका के आधार पर एफआईआर की जांच को रोका नहीं जा सकता।
मामला रायपुर के मौदहापारा थाने में 22 जनवरी 2016 को दर्ज हुआ था। इसमें भारतीय दंड संहिता की धारा 420, 409, 120-बी और छत्तीसगढ़ निक्षेपकों के हितों का संरक्षण अधिनियम की धारा 10 के तहत अपराध दर्ज किया गया था। अभियोजन के अनुसार पीएसीएल के निदेशकों और एजेंटों ने जमीन आवंटन और आकर्षक रिटर्न का वादा कर निवेशकों से रकम जुटाई थी।
मेहता का दावा था कि उन्हें 8 फरवरी 2016 को कंपनी का स्वतंत्र निदेशक नियुक्त किया गया था और उनकी भूमिका निवेशकों की रकम लौटाने के लिए गठित जस्टिस आरएम लोढ़ा समिति की सहायता तक सीमित थी। उन्होंने जांच में अपने खिलाफ ठोस सामग्री नहीं मिलने और कई मामलों में जमानत मिलने का भी हवाला दिया था।
हाईकोर्ट ने कहा था कि एफआईआर में नाम नहीं होना भविष्य की जांच से स्वत: छूट नहीं देता। जांच के दौरान कोई सामग्री मिलने पर एजेंसी कानून के अनुसार कार्रवाई कर सकती है। इसके खिलाफ मेहता ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। 15 सितंबर 2026 को मुख्य न्यायाधीश और जस्टिस जायमाल्या बागची व जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप का आधार नहीं पाया और एसएलपी खारिज कर दी।



