प्रागैतिहासिक छेरछेरा उत्सव और परंपरा –

रायपुर/
छेरछेरा छत्तीसगढ़ का ऐसा त्यौहार जिसे दान की महत्ता से जोड़कर देखा जाता है। छत्तीसगढ़ की त्योहारों को समझने वाले छेरछेरा की महत्ता बहुत अच्छे से जानते हैं। यह त्यौहार हमारी संस्कृति और अनादि काल की वह व्यावसायिक एवं व्यवहारिक विरासत को संभाले हुए हैं। छेरछेरा एक दान की परंपरा से जुड़ा त्यौहार है एवं हक से एक दिन बिना लज्जा एवं शर्म से मांगने का दिन भी, पूरे देश में एक छत्तीसगढ़ ही है जो इस पारंपरिक त्यौहार को मानता है।
छत्तीसगढ़ को समझने के लिए छत्तीसगढ़ की ग्रामीण परिवेश को समझना होगा। छत्तीसगढ़ के गांव में आज भी लोग एक घर से दूसरे घर “चाहे पक्की हुई सब्जी हो या घर की बाड़ी में लगी हुई सब्जी हो” एक दूसरे के घर लेने देने की परंपरा है। ज्यादातर गांव में बोले जाने वाली लाइन “तू हर घर काय साग ये देबे तो” यह हक से मांगने और हक से देने की परंपरा है। छेरछेरा पुन्नी यह पौष मास की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। छत्तीसगढ़ के गांव में बच्चे बूढ़े सब छेरछेरा मांगते हैं और मांगते समय एक वाक्य कहते हैं “छेरछेरा माई कोठी के धन ला हेर हेरा” यह वाक्य इसके पीछे की व्यवस्था समझने के लिए पर्याप्त है।
जैसा कि आज हम देखते हैं धान बेचने एवं लेने के लिए संग्रहण केंद्र होता है, सरकार की एवं निजी भी तो यह एक संग्रहण का माध्यम था। पहले गांव के घर मुश्किल से 15-20 घर होते थे। तो वे आसपास के गांव में जाकर धान एवं अनाज मांगते थे, यह सिर्फ एक दिन नहीं होता था कई दिनों तक होता था। वर्तमान समय में भी अभी आप देखेंगे सहकारी मंडी में धान संग्रहण हो रहा है। वैसे ही पहले उतने आधुनिक चीज नहीं थी जैसे धान मिजाई के लिए ट्रैक्टर, थ्रेसर इत्यादि तो पहले गांव में “बेलन और दउरी” से धान मिंजा जाता था। जिसका बढ़होना करके पौष पुन्नी तक घर की कोठी में संग्रहण कर लिया जाता था। फिर अब किसान एवं गांव वाले साथ ही घर में काम करने वाले बनिहार (नौकर), एक गांव से दूसरे गांव छेरछेरा मांगने जाते थे। यह पूर्ण रूपेण भिक्षा मांगना ही था, क्योंकि इस सांसारिक युग में बिना मांगे और दान दिए यह सामाजिक तंत्र नहीं चल सकता। छेरछेरा को अगर हम अपने पुरखों की सामाजिक एवं व्यापारिक व्यवस्था के रूप में देखें तो कोई गलत नहीं होगा, यह प्रथम दृश्य ही प्रतीत होता है कि प्राचीन धान एवं अनाज संग्रहण व्यवस्था थी, क्योंकि पहले छेरछेरा में दान एक सुपा या एक टूकनी धान देकर किया जाता था।
इसलिए इस त्यौहार को धान संग्रहण से जोड़कर देखा जा सकता है, अब सवाल यह भी है की भिक्षा मांगने की व्यवस्था कहां से आई होगी। तो समझ में आता है कि भारत बुद्ध का देश रहा है। और छत्तीसगढ़ की सिरपुर को विश्व के सबसे बड़े एवं महत्वपूर्ण बौद्ध धरोहर स्थलों में से एक माना जाता है। बौद्ध धर्म में बौद्ध भिक्षु होते हैं जो भिक्षा मांगने का कार्य करते हैं बौद्ध धर्म में तीन पिटक होते हैं जिसमें विनय पिटक में भिक्षा मांगने वाले भिक्षु भिक्षुणियों के नियम के बारे में वर्णन है।
इसमें कुछ शब्द है जो छेरछेरा एवं बौद्ध भिक्षा के मूल भाव को जोड़ता है—
पालि साहित्य में लिखा है—-
“दानम देती मनुसनाम”
“अलोभम करुणा सह”
“पुन्नम वदधाति जीवितम”
अर्थात- दान करने से मनुष्य में, आलोभ और करुणा बढ़ती है, और जीवन में पुण्य की वृद्धि होती है।
और छत्तीसगढ़ के ग्रामीण अंचल में यही भाव रहती है या यूं कहे यही छेरछेरा की मूल आत्मा है।
क्योंकि विनय पिटक में पौष मास और पूर्णिमा बौद्ध परंपरा में दान के लिए शुभ मानी जाती है खासकर धान कटाई के बाद अन्न दान के लिए। और छत्तीसगढ़ का छेरछेरा भी पौष पूर्णिमा को ही मनाया जाता है और ध्यान देने वाली बात है, विश्व का सबसे बड़ा बौद्ध धरोहर छत्तीसगढ़ के सिरपुर में है, और प्राचीन काल में वहां हजारों की संख्या में बौद्ध भिक्षु रहे होंगे, जो एक साथ पौष पुन्नी में मांगने निकलते रहे हो, और छत्तीसगढ़ के लोग आज भी दान के नाम और पुण्य के लिए खुशी-खुशी दान करते हैं यही बौद्ध काल में भी रहा होगा।
छेरछेरा पुन्नी ही पौष पुन्नी, दोनों की समानता भिक्षा संग्रहण “धान कटाई के बाद” पौष पूर्णिमा को घर-घर से अन्न एकत्र करना, भिक्षुओं / गरीबों को देना।अगर इसे तार्किक दृष्टिकोण से देखें तो यही बौद्ध भिक्षुओं की मांगने की परंपरा छेरछेरा में रूपांतरित हो गई, क्योंकि छत्तीसगढ़ में लोग बड़े उत्साही और अच्छी चीजों को खुले विचारों से खुद में समाहित करने वाले रहे हैं, जैसे कोई पंथ हो या धर्म हो।
देखने में यह भी मिलता है हमारे छत्तीसगढ़ के संत शिरोमणि बाबा गुरु घासीदास जी का ससुराल भी सिरपुर है।
इससे यह तो समझ में आता है कि सतपथ, दया, करुणा, अलोभ ,दान एक ज्ञान के रूप में मिली, जो धीरे-धीरे लोक परंपरा में रूपांतरित हो गई। और सामाजिक भेदभाव उच-नीच, अमीर- गरीब, सब बंधन को तोड़ते हुए एक धागे में पीरो दी और एक त्यौहार के नाम का उदय हुआ जिसे हमने छेरछेरा कहा।
छेरछेरा हमारे व्यवसायिकता वैज्ञानिकता का एक जीवंत उदाहरण है। जिसे आज हम आधुनिक युग 21वीं सदी में ट्रेड कहते हैं, इस ट्रेड या ट्रेडिंग को कई हजारों सालों पहले छेरछेरा कहा गए हैं। गलती उनकी नहीं हमारी है, जो अपने भाषा और धरोहर को हम खुद ही समझ नहीं पाए। जिसे बाकी दुनिया समझ बहुत आगे निकल गई और हमारे पास सांकेतिक त्योहार होते हुए भी हम किसी के अपनाने का इंतजार करते रहे।
छेरछेरा छत्तीसगढ़ की व्यापारिक विरासत है, और प्राचीन धान संग्रहण का मुख्य माध्यम, एवं इसका एक पहलू अकाल के समय अनाज आपूर्ति भी देखी जा सकती है, साथ ही दान की महत्ता का सबसे बड़ा उदाहरण जो आज भी बिना अमीर गरीब और निश्छलता एवं सच्चे भाव से दान देने के लिए प्रेरित करती है, जिसे आज भी एक पूरे छत्तीसगढ़ में मनाते हैं।



