महासंघ बनाम विनेश, भारतीय कुश्ती में फिर छिड़ी नई जंग, डोपिंग और अनुशासनहीनता पर वापसी रुकी

- नियमों की सख्ती या विरोध की आवाज दबाने की कोशिश?
- विनेश बोलीं-कोई ताकत मुझे झुका नहीं सकती, संघर्ष जारी रहेगा
नई दिल्ली। भारतीय कुश्ती एक बार फिर ऐसे मोड़ पर खड़ी है, जहां मुकाबला मैट पर कम और व्यवस्थाओं के भीतर ज्यादा दिखाई दे रहा है। स्टार पहलवान विनेश फोगाट को भारतीय कुश्ती महासंघ द्वारा जारी कारण बताओ नोटिस ने सिर्फ एक खिलाड़ी की वापसी पर सवाल नहीं खड़े किए, बल्कि भारतीय खेल तंत्र की कार्यशैली, पारदर्शिता और खिलाड़ियों के साथ संबंधों को लेकर पुरानी बहस को फिर जिंदा कर दिया है।
महासंघ ने विनेश पर अनुशासनहीनता, डोपिंग रोधी नियमों के उल्लंघन और निर्धारित प्रक्रिया पूरी किए बिना प्रतिस्पर्धा में लौटने की कोशिश जैसे आरोप लगाए हैं। इसके साथ ही उन्हें जुलाई तक घरेलू प्रतियोगिताओं में भाग लेने से रोक दिया गया। तकनीकी रूप से यह कार्रवाई नियमों के दायरे में दिखाई देती है, लेकिन खेल जगत में सवाल इस बात को लेकर ज्यादा उठ रहे हैं कि क्या यही सख्ती हर खिलाड़ी पर समान रूप से लागू होती है या फिर मामला किसी बड़े टकराव की पृष्ठभूमि से भी जुड़ा हुआ है।
दरअसल, यह विवाद केवल एक नोटिस भर नहीं है। इसकी जड़ें पिछले कई वर्षों में फैले उस संघर्ष में हैं, जिसने भारतीय कुश्ती को देश की सबसे विवादित खेल संस्थाओं में ला खड़ा किया। पूर्व अध्यक्ष ब्रजभूषण शरण सिंह पर लगे यौन उत्पीड़न के आरोपों के खिलाफ जब देश के शीर्ष पहलवान सड़कों पर उतरे थे, तब विनेश फोगाट आंदोलन का सबसे मुखर चेहरा बनी थीं।
जंतर-मंतर का धरना केवल खिलाड़ियों का प्रदर्शन नहीं था, बल्कि खेल संस्थाओं की जवाबदेही पर सीधा सवाल था। उस आंदोलन ने देश को यह सोचने पर मजबूर किया था कि क्या अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मेडल जीतने वाले खिलाड़ियों को अपने अधिकारों के लिए भी सड़क पर उतरना पड़ेगा। हालांकि बाद में प्रशासनिक बदलाव हुए, लेकिन खिलाड़ियों और महासंघ के बीच भरोसे की खाई पूरी तरह कभी नहीं भर सकी। अब विनेश पर हुई ताजा कार्रवाई को उसी लंबे टकराव की अगली कड़ी माना जा रहा है।
महासंघ का तर्क है कि विश्व डोपिंग रोधी एजेंसी के नियमों के तहत संन्यास से लौटने वाले खिलाड़ी को छह महीने पहले सूचना देनी होती है और परीक्षण प्रक्रिया में शामिल होना अनिवार्य है। यह नियम अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लागू हैं और उनका पालन जरूरी है। लेकिन दूसरी ओर खिलाड़ियों के एक वर्ग का मानना है कि नियमों की व्याख्या और उनका इस्तेमाल कई बार परिस्थितियों के हिसाब से किया जाता है। यही वजह है कि यह विवाद खेल से ज्यादा संस्थागत विश्वास का मुद्दा बन गया है।
पेरिस ओलंपिक में 100 ग्राम अधिक वजन के कारण फाइनल से बाहर होना पहले ही विनेश के करियर का सबसे दर्दनाक अध्याय बन चुका है। उस घटना ने न केवल उन्हें मानसिक रूप से झकझोरा, बल्कि भारतीय खेल प्रबंधन पर भी सवाल उठाए थे। इसके बाद संन्यास और फिर वापसी की घोषणा ने यह संकेत दिया था कि विनेश अभी संघर्ष खत्म करने के मूड में नहीं हैं। लेकिन वापसी से पहले ही नोटिस ने साफ कर दिया कि उनका रास्ता आसान नहीं होने वाला।
इस पूरे घटनाक्रम का सबसे चिंताजनक पहलू यह है कि भारतीय कुश्ती लगातार खेल उपलब्धियों से ज्यादा विवादों के कारण चर्चा में रहती है। युवा खिलाड़ी अब मैट से ज्यादा व्यवस्थागत संघर्षों की कहानियां सुन रहे हैं। खेल विशेषज्ञ मानते हैं कि यदि खिलाड़ियों और संघों के बीच संवाद, पारदर्शिता और भरोसा बहाल नहीं हुआ, तो इसका असर आने वाले वर्षों में भारतीय कुश्ती की नई पीढ़ी पर भी पड़ेगा।
फिलहाल विनेश फोगाट और कुश्ती महासंघ आमने-सामने हैं, लेकिन असली सवाल इससे कहीं बड़ा है कि क्या भारतीय खेल संस्थाएं अपने खिलाड़ियों को प्रतिद्वंद्वी की तरह देखना बंद कर पाएंगी, या फिर हर बड़ा खिलाड़ी अंतत: व्यवस्था से टकराने को मजबूर होता रहेगा।



